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आइए जानते हैं यह आईपीएस संजीव भट्ट कौन है और इन्हें जेल में क्यों डाला गया है ?

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आइए जानते हैं यह आईपीएस संजीव भट्ट कौन है और इन्हें जेल में क्यों डाला गया है ? इनकी रिहाई की मांग भारत की जनता क्यों चाहती है ?
तो सुनिए संजीव भट्ट गुजरात काडर के आईपीएस अधिकारी थे ! जिन्होंने 2002 में गुजरात दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका पर सवाल खड़ा किए थे ! संजीव भट्ट आईआईटी मुंबई के छात्र थे ! जिन्हें 1988 में गुजरात काडर से आईपीएस ज्वाइन किया था !
उन्हें साल 2011 में बिना इजाजत नौकरी से गैरहाजिर रहने और सरकारी गाड़ी के कथित दुरुपयोग के मामले में नौकरी से सस्पेंड किया गया था । और फिर 2015 में नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया ।
यह खबर 20 जून 2019 को बीबीसी न्यूज़ में भी आई थी जिसके संवाददाता विनीत खेर थे। 1990 में जब बिहार में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा को रोका गया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था । गिरफ्तारी के बाद भारत बंद का ऐलान किया गया था । कई जगहों पर दंगे भी भड़क उठे थे । तो कई जगहों पर दंगाइयों ने आगजनी भी किए थे। कई लोगों की गिरफ्तारी भी हुई। उनमें 29 साल के प्रभूदास माधवजी भी थे । वह दिन 30 अक्टूबर 1990 का था ।
प्रभुदास के बड़े भाई के मुताबिक प्रभूदास को घर से उठाकर ले जाने वालों में संजीव भट्ट भी शामिल थे। उन्होंने यह भी कहा कि डंडे की मार और उठक बैठक कराने की वजह से उसकी किडनी पर असर आ गया । गुर्दे की चोट के कारण प्रभूदास की 18 नवंबर को मौत हो गई। प्रभुदास के भाई के मुताबिक -: उन्होंने अपने भाई के पोस्टमार्टम के लिए एसडीएम को अर्जी दी। जिसमें उन्होंने लिखा कि पुलिस की मार से भाई की मौत ।
हाईकोर्ट की आलोचना के बाद 2012 में चार्यशीट दायर हुई । जबकि पूरी तरह सुनवाई 2015 में शुरू हुई ।
दूसरी तरफ संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता भट्ट ने एक बयान जारी कर बताई गिरफ्तार किए गए 133 लोगों में मृतक और उसका भाई ,
संजीव भट्ट या उनके स्टाफ की हिरासत में नहीं थे ।
बयान में कहा गया है।
ध्यान देने वाली बात है यह कि 21 अक्टूबर 1990 को जब स्थानीय पुलिस ने नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने इन लोगों को हाजिर किया गया तो मृतक प्रभूदास माधव जी या अन्य गिरफतार 133 दंगाइयों ने किसी भी तरह के टॉर्चर या कोई अन्य शिकायत दर्ज नहीं कराई। हिरासत में टॉर्चर की शिकायत प्रभूदास माधव जी की मौत के बाद उनके बड़े भाई ने दर्ज कराई जो कि विश्व हिंदू परिषद और बीजेपी के सक्रिय सदस्य थे ।
श्वेता भट्ट के मुताबिक संजीव भट्ट के खिलाफ दर्ज कराई गई शिकायत राजनीति बदले की कार्रवाई का एक सटीक उदाहरण है ।
संजीव भट्ट नोडल ऑफिसर भी थे।
जब 2002 में गुजरात में दंगे हुए थे उस समय भी संदीप भट्ट इसी पद पर तैनात थे। और इसे लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका पर सवाल खड़ा किए थे ।
बहुत कम ही लोग जानते होंगे कि 2002 से 2003 के बीच संजीव भट्ट साबरमती जेल में तैनात थे किसी कारण से उनका तबादला कर दिया गया था। सरकार के इस फैसले के विरोध में जेल के लगभग 2000 कैदियों ने अगले 6 दिनों तक भूख हड़ताल की उनमें से छह कैदियों ने तो अपनी नशे भी काट ली थी।
क्या आपने कभी सुना है एक पुलिस अधिकारी के ट्रांसफर के लिए जेल के कैदी भूख हड़ताल कीया हो या अपनी नसें काटी हो संजीव भट्ट का उन कैदियों से कोई रिश्ता तो था नहीं । फिर कैदियों को पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट से इतनी लगाव क्यों ? संजीव भट्ट का व्यवहार इतना मानवीय था कि कैदी उन्हें वहां से जाने देना ही नहीं चाहते थे । सोचने वाली बात है उसी इमानदार पुलिस अफसर को एक कैदी को टॉर्चर करने के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई गई ।
और यही कारण है कि आईपीएस संजीव भट्ट की रिहाई की मांग देश की जनता कर रही है

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